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गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल विकार (gastrointestinal disorders) में कई स्थितियाँ शामिल हैं, जैसे
गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रोग किसी विशेष पोषक तत्व की कमी या अधिकता के कारण हो सकते हैं। पाचन संबंधी समस्याओं वाले व्यक्तियों का निदान अक्सर इन लक्षणों के आधार पर किया जाता है
आहार न केवल किसी व्यक्ति की वृद्धि और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, बल्कि शरीर के कई महत्वपूर्ण कार्यों को भी नियंत्रित करता है। हमारे आहार में कार्बोहाइड्रेट (carbohydrates), प्रोटीन (proteins) और वसा (fats) का अनुपात यह निर्धारित और नियंत्रित करता है कि रक्तप्रवाह में कितने गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल हार्मोन (gastrointestinal hormones) निकलते हैं। ये हार्मोन गतिशीलता (motility), स्राव और अवशोषण (secretion and absorption), भूख और स्थानीय प्रतिरक्षा रक्षा (local immune defences) जैसे विभिन्न कार्यों को नियंत्रित करते हैं1।
अनाज और मिठाइयों से भरपूर आहार इरिटेबल बाउल सिंड्रोम के रोगियों में गंभीर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल लक्षणों से जुड़ा हुआ है2।
Nilholm और उनके सहयोगियों द्वारा किए गए एक ओपन-लेबल अध्ययन में पाया गया कि इरिटेबल बाउल सिंड्रोम वाले 66.3% व्यक्तियों ने स्टार्च (starch) और सुक्रोज (sucrose) में कम आहार पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी3।
एशिया में किण्वित उत्पादों (fermented products) से बने जटिल खाद्य पदार्थों के कारण इरिटेबल बाउल सिंड्रोम का प्रचलन पश्चिमी दुनिया की तुलना में कम है।
IBS और फंक्शनल एब्डॉमिनल ब्लोटिंग (functional abdominal bloating) वाले 30 रोगियों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि दो महीने की अवधि के बाद, Low FODMAPs (फर्मेंटेबल ऑलिगोसैकराइड्स, डाइसैकराइड्स, मोनोसैकराइड्स और पॉलीऑल्स) आहार की प्रतिक्रिया 70% से अधिक रोगियों में पेट दर्द, ब्लोटिंग, दस्त, गैस, मतली और थकान जैसे समग्र लक्षणों को नियंत्रित करने में सकारात्मक रही। इसके अलावा, लगभग 48% रोगियों में कब्ज की समस्या नियंत्रित हुई4।
इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज एक ऑटोइम्यून विकार (autoimmune disorder) है जो छोटी और बड़ी आंत में सूजन का कारण बनता है। इसमें क्रोन्स डिजीज (Crohn's disease) और अल्सरेटिव कोलाइटिस (ulcerative colitis) जैसे प्रमुख रूप शामिल हैं।
जहाँ क्रोन्स डिजीज में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट के किसी भी हिस्से में सूजन हो सकती है, वहीं अल्सरेटिव कोलाइटिस में सूजन केवल बड़ी आंत तक सीमित रहती है।
तेज़ औद्योगीकरण और पश्चिमीकरण के कारण, इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज के मामलों की संख्या हर साल काफ़ी बढ़ रही है।
Rotem Sigall-Boneh द्वारा प्रस्तावित एक अभिनव दृष्टिकोण, जिसे CD एक्सक्लूजन डाइट (CD exclusion diet) कहा जाता है, आशाजनक परिणाम प्रदान करता है। वर्ष 2014 में 45 रोगियों पर एक अध्ययन किया गया। इसमें सभी रोगियों को आधी कैलोरी एंटरल न्यूट्रिशन (enteral nutrition) से और आधी कैलोरी एक एक्सक्लूजन डाइट से मिली, जिसमें ग्लूटेन (gluten), डेयरी उत्पाद, ग्लूटेन-फ्री बेक्ड सामान, ब्रेड, पशु वसा, प्रोसेस्ड मीट, इमल्सीफायर वाले उत्पाद, डिब्बाबंद सामान और सभी पैकेज्ड उत्पादों से परहेज़ किया गया। गहन विश्लेषण के बाद पाया गया कि 70% रोगियों में रोग शांत (remission) हुआ और 70% व्यक्तियों में C रिएक्टिव प्रोटीन (C reactive protein) उल्लेखनीय रूप से सामान्य हुआ। इसी तरह, सात रोगियों पर किए गए एक समानांतर अध्ययन में देखा गया कि जिन छह रोगियों को बिना किसी फॉर्मूला के केवल CDED आहार दिया गया, उन्हें अकेले ठोस आहार से ही क्लिनिकल रेमिशन प्राप्त हुआ5,6।
फाइबर (fiber) इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज के कारण होने वाले फ्लेयर (flares) को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। Brotherton और उनके सहयोगियों द्वारा किए गए एक कोहॉर्ट अध्ययन में क्रोन्स डिजीज वाले 1139 रोगियों और अल्सरेटिव डिजीज वाले 489 रोगियों को शामिल किया गया और 6 महीने की अवधि के लिए उनका मूल्यांकन किया गया। पाया गया कि जिन रोगियों का फाइबर सेवन 23g/day से अधिक था, उनमें उन रोगियों की तुलना में फ्लेयर का जोखिम 40% कम था जिनका फाइबर सेवन 10g/day से कम था। यह भी देखा गया कि उच्च फाइबर वाले खाद्य पदार्थों से परहेज़ करने वाले 30% रोगियों में फ्लेयर की आशंका अधिक थी7।
पाचन संबंधी समस्याओं की जाँच में कोलोनोस्कोपी (colonoscopy), अपर GI एंडोस्कोपी (upper GI endoscopy), कैप्सूल एंडोस्कोपी (capsule endoscopy), एंडोस्कोपिक रेट्रोग्रेड कोलैंजियोपैंक्रिएटोग्राफी (ERCP), एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड और पर्क्यूटेनियस एंडोस्कोपिक गैस्ट्रोस्टॉमी शामिल हैं8।
संदर्भ (REFERENCES):